Tuesday, 12 May 2015

शायरी

* आदमी जब उदास होता है, सत्य के आसपास होता है।

* होकर मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिये
  जिन्दगी और है सूरज से निकलते रहिए।

* अकेलापन नहीं खलता उदासी भाग जाती है
   कभी खामोशियों में जब तुम्हारी याद आती है।

* अभी अरुज है तेरा मगर ख़याल रहे
   कि जोर तेरा भी ऐ आफ़ताब टूटेगा।

* या रब ये भेद क्या है कि राहत की फ़िक्र ने
   इनसाँ को और गम में गिरफ्तार कर दिया।

* कल सागर की लहरों को देखा
   तो तेरी मस्ती का ख़याल आया।

* थे सहारे और भी दुनिया में जीने के लिए
   जाने क्यों तेरे ही दामन का ख़याल आता रहा।

* जिसके ख्याल में हूँ गम उसको भी कुछ खयाल है ?
  मेरे लिए यही सवाल सबसे बड़ा सवाल है।

* हजारों उड़ते हैं इस दर से जिन्दगी लेकर
  ये कैसे कह दूँ के तुमको मेरा ख़याल नहीं।

* यहाँ हर एक को चाहत है धन की
  है किसको फ़िक्र अब अपने वतन की।

* किस-किस की फ़िक्र कीजिए किस-किस को रोइए
  आराम बड़ी चीज है मुँह ढक के सोइए।

* इतना रहे ख़याल सताने के साथ-साथ
  हम भी बदल रहे हैं ज़माने के साथ-साथ।

* अजब ये जिन्दगी की कैद है, दुनिया का हर इन्साँ,
  रिहाई माँगता है और रिहा होने से डरता है।

* मैं खुद भी एहतियातन इस गली से कम गुजरता हूँ
  कोई मासूम क्यों मेरे लिए बदनाम हो जाए।

* उनकी गली में जिस दम पहुँचा मेरा जनाजा
   हसरत से देखते थे पर्दा उठा-उठा के।

* उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
  न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए।

* जितना मायूस है वो शख्स बिछड़कर मुझसे
  इतनी शिद्दत से तो मैंने उसे चाहा भी न था।

* हर गली, हर कूचे पर मेरी मजार है
  जहाँ हुस्न देखा वहीं मर गए।

* न जी भर के देखा न कुछ बात की
  बड़ी आरजू थी उनसे मुलाकात की।

* जो तमन्ना दिल में थी वो दिल में घुटकर रह गई
  उसने पूछा भी नहीं हमने बताया भी नहीं।

* अब उनको देखने की तमन्ना ही मर गई
  देखे हुए किसी को जमाना गुजर गया।

* उम्रे-दराज माँग के लाए थे चार दिन
  दो आरजू में कट गए दो इंतजार में।

* इक बार दिल ने की थी तेरी आरजू की भूल
  जालिम मुसीबतों में गिरफ़्तार हो गया।

* हसरत पे उस मुसाफ़िरे बेकस की रोइए
  जो थक के बैठ जाता हो मंजिल के सामने।

* बातों - बातों में कोई बात खटक जाती है
  एक - दो लफ़्ज ही बेगाना बना देते हैं।

* साफ जाहिर है निगाहों से कि हम मरते हैं
  मुँह से कहते हुए ये बात मगर डरते हैं।

* अजीब लहजा है दुश्मन की मुस्कुराहट का
  कभी गिराया है मुझको कभी संभाला है।

* चुप हैं किसी सबब से तो पत्थर हमें न जान
  दिल पे असर हुआ है तेरी बात - बात का।

* हरेक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है
  तुम्हीं कहो के ये अन्दाज़े गुफ्तगू क्या है।

* हम नहीं तीर और तलवार से मरने वाले
  क़त्ल करना है तो एक तिरछी नज़र काफी है।

* खंजर से करो बात न तलवार से पूछो
  मैं क़त्ल हुआ कैसे मेरे यार से पूछो।

* जख़्म तलवार के गहरे भी हों मिट जाते हैं
  लफ़्ज तो दिल में उतर जाते हैं खंजर की तरह।

* क़त्ल करके क़ातिल ने बहुत हाथ मले
  उसने जब मेरे तड़पने का सलीका देखा।

* मुँह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन
  आवाजों के बाजार में ख़ामोशी पहचाने कौन।

* तुमने चुप रहके सितम और भी ढाया मुझ पर
  तुमसे अच्छे हैं मेरे हाल पे हँसने वाले।

* मोहब्बत के लिए कुछ खास दिल मख़सूस होते हैं
ये वो नग़मा है जो हर साज पे गाया नहीं जाता।

* जिन्दगी का साज भी क्या साज है
   बज रहा और बेआवाज है ।

* मोहब्बत सोज भी है साज भी है
  ये ख़ामोशी भी है आवाज भी है ।

* लो अब मैं रुख़सत होता हूँ सम्हालो साजे गजल
  छेड़ो नए तराने कि मेरे नग़्मों को नींद आती है।

* दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब
  क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो ।

* कहते हो तुम दिल का भरोसा नहीं है
  महफ़िल में मचल जाए ऐसा तो नहीं है ।

* जो तेरी बज़्म से उठा वो इस तरह उठा
  किसी की आँख में आँसू किसी के दामन में ।

* उदास - उदास है चेहरा निग़ाह बरहम है
  ये जिन्दगी है कि ये जिन्दगी का मातम है ।

* हुस्न वालों की मासूम जफ़ाएँ देखो
  क़त्ल करके भी वो क़ातिल नहीं होते।

* मंजर भी हादसे का अजीबो गरीब था
  वो आग से जला जो नदी के करीब था।

* तेरे पाँव के नीचे कोई जमीन नहीं
  कमाल ये है के फिर भी तुझे यकीन नहीं।

* अपनी बुलंदियों पर मत नाज़ करो इतना
  हमने तो सितारों को भी गिरते हुए देखा है।

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